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महासमुंदएक दिन पहले

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  • एकादशी के बाद इस व्रत पर किए जाने वाले कर्मों में सात्विक गुणों का होना अनिवार्य

कार्तिक कृष्ण द्वादशी को गोवत्स द्वादशी के नाम से जाना जाता है. इसे बछ बारस का पर्व भी कहते हैं। यह एकादशी के बाद आता है। गोवत्स द्वादशी के दिन गाय माता और बछड़े की पूजा की जाती है। इस बार आज (12 नवंबर को ) गो वत्स द्वादशी व्रत किया जाएगा। इसमें गाय और उसके बछड़े की पूजा की जाती है।
भविष्य पुराण के मुताबिक गाय लक्ष्मी का रूप होती है। गाय की आंखों में सूर्य-चंद्रमा, मुख में रुद्र, गले में विष्णु, शरीर के बीच में सभी देवी-देवता और पिछले हिस्से में ब्रह्मा का वास होता है। इसलिए गाय और उसके बछड़े की पूजा से लक्ष्मी जी सहित सभी देवी-देवता प्रसन्न होते हैं। महिलाएं ये व्रत अपने परिवार की समृद्धि और अच्छी सेहत की कामना के लिए करती हैं।
नगर पुरोहित पंकज तिवारी ने बताया कि गोवत्स द्वादशी के विषय में एक कथा अनुसार राजा उत्तानपाद और उनकी पत्नी सुनीति ने पृथ्वी पर इस व्रत को आरंभ किया । इस व्रत के प्रभाव से राजा-रानी को बालक ध्रुव की प्राप्ति हुई।
दस नक्षत्रों से युक्त ध्रुव आज भी आकाश में दिखाई देते है । शास्त्रानुसार ध्रुव तारे को देखने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है । संतान सुख की कामना रखने वालों के लिए यह व्रत शुभ फल दायक होता है। गोवत्स द्वादशी के दिन किए जाने वाले कर्मों में सात्त्विक गुणों का होना अनिवार्य है।
इसलिए पूज्यनीय है गो-माता : गाय भगवान श्री कृष्ण को अतिप्रिय है। गो पृथ्वी का प्रतीक है। गो माता में सभी देवी-देवता विद्यमान रहते हैं सभी वेद भी गायों में प्रतिष्ठित है। गाय से प्राप्त सभी घटकों में जैसे दूध,घी,गोबर अथवा गोमूत्र में सभी देवताओं के तत्व संग्रहित रहते हैं। ऐसी मान्यता है कि सभी देवी-देवताओं एवं पितरों को एक साथ खुश करना है तो गोभक्ति-गोसेवा से बढ़कर कोई अनुष्ठान नहीं है। गौ माता को बस एक ग्रास खिला दो, तो वह सभी देवी-देवताओं तक अपने आप ही पहुंच जाता है। भविष्य पुराण के अनुसार गौमाता के पृष्ठदेश में ब्रह्म का वास है, गले में विष्णु का, मुख में रुद्र का, मध्य में समस्त देवताओं और रोमकूपों में महर्षिगण, पूंछ में अनंत नाग, खूरों में समस्त पर्वत, गोमूत्र में गंगादि नदियां, गोमय में लक्ष्मी और नेत्रों में सूर्य-चन्द्र विराजित हैं।

इस तरह करें गोवत्स द्वादशी का व्रत

  • इस पर्व पर गीली मिट्टी से गाय, बछड़ा, बाघ तथा बाघिन की मूर्तियां बनाकर नीचे दिए गए चित्र के अनुसार पटे पर रखी जाती है।
  • अगर आपके यहां गाय और बछड़ा नही है तो आप किसी दूसरे की गाय और बछड़े की पूजा कर सकते हैं। यदि गांव में भी गाय न हो तो मिट्टी के गाय बनाकर उनकी पूजा कर सकते हैं।
  • उन पर दही, भीगा हुआ बाजरा, आटा, घी आदि चढ़ाएं।
  • इनका रोली से तिलक करें और चावल-दूध चढ़ाएं।
  • इसके बाद मोठ, बाजरा पर रुपया रखकर बयान अपनी सास को दे दें। इस दिन बाजरे की ठंडी रोटी खाई जाती है।
  • इस दिन गाय का दूध या इससे बनी दही न खाएं। साथ ही गेहूं
  • व चावल भी न खाएं।
  • अपने कुंवारे लड़के की कमीज पर सांतियां बनाकर तथा उसे पहनाकर कुएं को पूजा जाता है।
  • इससे आपके बच्चे की जीवन की रक्षा होती है। साथ ही वो बुरी नजर से भी बचा रहता है।
  • जो महिलाएं व्रत करती हैं वो सुबह स्नान आदि कर निवृत्त हो जाएं। गाय को उसके बछडे़ समेत स्नान करएं और नए वस्त्र ओढ़ाएं। फूलों की माला पहनाएं। फिर गाय-बछड़े के माथे पर चंदन का तिलक लगाएं।
  • फिर तांबे का एक पात्र लें। इसमें अक्षत, तिल, जल, सुगंध तथा फूलों को रख लें।



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