जींद9 मिनट पहले

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कठपुतली के समान है मनुष्य का जीवन। कठपुतली की तरह हमारी डोर भी किसी ओर के हाथ में है। वह जैसा चाहता है हमसे वैसा अभिनय करवाता है। हमें सिर्फ उसके निर्देशन में अभिनय करते जाना होता है। हमारे जीवन की कहानी वो पहले ही लिख चुका है। इसलिए जीवन में कभी उतार-चढ़ाव आएं तो न कभी ज्यादा भयभीत होना और न ही ज्यादा खुश। यह प्रवचन माता वैष्णवी धाम के आचार्य पवन शर्मा ने कहे।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक मनुष्य एक सीमित अवधि के लिए इस संसार में आता है और परमपिता ने हमारे हिस्से में जितना सुख या दु:ख लिखा है उसे हमें हर हाल में भोगना ही पड़ता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की नियति तय है। और यही प्रारब्ध यानि भाग्य है। आचार्य के अनुसार हमारे प्रारब्ध से हमारा पुरुषार्थ यानि हमारा कर्म जुड़ा हुआ है।

इन दोनों के बीच गहरा रिश्ता है। कुछ लोग कहते हैं कि जब प्रत्येक मनुष्य की नियति तय है और उसके भाग्य में जो लिखा है, वही होना है तो फिर कर्म करके क्या लाभ। इसी तरह दूसरे मत के लोगों का मानना है कि भाग्य नाम की कोई चीज नहीं होती। जितना और जैसा कर्म किया जाता है उसी के अनुरूप फल मिलता है। असल में प्रारब्ध और पुरुषार्थ दोनों की ही अपनी-अपनी महत्ता है।

तर्क न करें क्योंकि तर्क से तकरार बढ़ती है : शास्त्री

भारतेंदू शास्त्री ने बुधवार को कहा कि एक बार आप अपने क्रोध, अहंकार को ऑनलाइन बेच कर देखो कोई चवन्नी भी नहीं देगा। तब आपको पता चलेगा कि आपने कितनी फालतू चीज उठा रखी है। शास्त्री ने कहा कि प्रभु श्रीराम ने अपनी जिंदगी में दु:खों का हंसकर मुकाबला किया। कांटों पर चलने वाला व्यक्ति अपनी मंजिल पर जल्दी पहुंच जाता है, क्योंकि कांटे कदमों की रफ्तार को बढ़ा देते हैं। उन्होंने कहा कि तर्क न करें क्योंकि तर्क से तकरार बढ़ती है।

समर्पण से सौहार्द्र बढ़ता है। तर्क सिर्फ उलझाता है, समर्पण समाधान देता है। सास ने कहा यूं, बहू ने कहा क्या? बस यहीं से महाभारत शुरू हो जाता है। जो सुख समर्पण में वह अकड़ में नहीं है। जो सुख झुकने में है वो तनने में कहां है? तर्क नर्क है, समर्पण स्वर्ग है। जीवन को समर्पण भावना से जीएं। क्रोध से बचें, क्रोध हमारा बोध खो देता है। स्वयं को कमजोर साबित मत होने दें क्योंकि डूबते सूरज को देखकर लोग घरों के दरवाजे तक बंद कर लेते हैं।



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