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इंदौरएक घंटा पहले

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जांबाज तुर्रा और रुणजी के वीर कलंगी योद्धाओं के बीच बेहद जोखिम भरा युद्ध होता है।

  • दिवाली के अगले दिन पढ़वा पर इंदौर से 56 किलामीटर दूर गौतमपुरा में होता है युद्ध

इंदौर के पास गौतमपुरा में धोक पढ़वा (गोवर्धन पूजा) पर दो दलों के बीच हाेने वाले हिंगोट युद्ध पर इस बार संशय के बादल छाए हुए हैं। युद्ध के दौरान दोनों दलों के योद्धाओं ने एक-दूसरे पर जलते हुए अग्निबाण (हिंगोट) से आक्रमण करते हैं। हमले में कुछ लाेग घायल भी होते हैं। दीपावली के अगले दिन प्रतिवर्ष जांबाज तुर्रा और रुणजी के वीर कलंगी योद्धाओं के बीच हाेने वाले इस बेहद जोखिम भरे हिंगोट युद्ध काे लेकर शांति समिति की बैठक में भी काेई निर्णय नहीं हो पाया।

पुलिस जहां युद्ध नहीं होने की बात कह रही है। वहीं, जनप्रतिनिधि परंपरा कायम रहे, इसके लिए सांकेतिक युद्ध करवाए जाने की बात कह रहे हैं। योद्धाओं ने अपनी पूरी तैयारी कर रखी है, अब यह युद्ध हाेगा या नहीं, यह दीपावली के दूसरे दिन धाेक पढ़वा पर ही पता चलेगा।

एक-दूसरे पर योद्धा जमकर बरसाते हैं आग के गोले।

एक-दूसरे पर योद्धा जमकर बरसाते हैं आग के गोले।

टीआई बोले- युद्ध नहीं, जनप्रतिनिधि बोले- सांकेतिक युद्ध हो
थाना प्रभारी रमेशचंद्र भास्करे ने कहा कि काेविड-19 के चलते किसी भी प्रकार के मेले व सामूहिक आयाेजन पर प्रतिबंध है। इसलिए इस बार हिंगोट युद्ध नहीं हाेगा। वहीं, इस पर जनप्रतिनिधियाें ने कहा कि हिंगोट युद्ध काे सांकेतिक रूप से कराया जा सकता है। उन्हाेंने कहा की दाेनाें ही दलाें के 5-5 याेद्धा यहां मैदान में आए व हिंगोट युद्ध सांकेतिक रूप से लड़े। जिसके चलते परंपरा कायम रहे। वहीं, हिंगोट युद्ध नहीं हाेने की जानकारी मिलते ही युवाओं ने फिर से साेशल मीडिया पर हिंगोट युद्ध नहीं ताे नगर पंचायत चुनाव में वाेट नहीं के मैसेज वायरल किए।

युद्ध के कई वीर योद्धा घायल भी होते हैं।

युद्ध के कई वीर योद्धा घायल भी होते हैं।

विधायक बोले- चुनावी सभा को परमिशन तो फिर युद्ध को क्यों नहीं
देपालपुर विधायक विशाल पटेल ने कहा कि युद्ध होना चाहिए। प्रशासन से कहना चाहता हूं कि चुनाव के भीतर जितनी गैदरिंग होती है। ऐसी सभाओं के लिए तो आप अनुमति देते हैं। हिंगोट युद्ध परंपराओं से जुड़ा हुआ है। धार्मिक आस्था से जुड़ा है, इसलिए अनुमति मिलनी चाहिए। अनुमति के लिए प्रयासरत हूं, अधिकारियों से चर्चा कर रहे हैं। डीआईजी हरिनारायण मिश्र ने कहा कि पूर्व में इस युद्ध में कई हादसे हो चुके हैं। लाेगों को इसके परिणाम को देखते हुए समझाइश दी जाती रही है कि इसे छोटे स्तर पर मनाया जाए। युद्ध में कई जान भी गई है। यदि जनभावना को देखते हुए यह युद्ध होता है तो लोग कोविड के नियमों का पालन जरूर करें। वहीं, अधिकारियों का कहना है कि परंपराओं पर रोक लगाना प्रशासन की मंशा नहीं है। हालांकि कोविड नियम अनुसार कोरोना जागरूकता और भीड़ नियंत्रण भी जरूरी है।

ऐसे होती है युद्ध की शुरुआत
दीवाली के अगले दिन पड़वा पर शाम four बजे तुर्रा-गौतमपुरा व कलंगी-रूणजी के निशान लिए दो दल यहां पहुंचते हैं। सजे-धजे ये योद्धा कंधों पर झोले में भरे हिंगोट (अग्निबाण), एक हाथ में ढाल व दूसरे में जलती बांस की कीमची लिए नजर आते हैं। योद्धा सबसे पहले बड़नगर रोड स्थित देवनारायण मंदिर के दर्शन करते हैं। इसके बाद मंदिर के सामने ही दर्शकों की सुरक्षा जालियों से घिरे मैदान में एक-दूसरे से करीब 200 फीट की दूरी पर दोनों दल आमने-सामने आ जाते हैं।

इसके बाद गौतमपुरा के तुर्रा दल द्वारा जलता हुआ हिंगोट रूणजी के कलंगी दल पर फेंकने के साथ ही इस युद्ध की शुरुआत हो जाती है। जैसे ही हवा में एक अग्निबाण चलता है, उसके बाद देखते ही देखते मैदान के दोनों छोर से योद्धा एक-दूसरे पर जलते हिंगोट फेंकने शुरू कर देते हैं। अंधेरा होने तक चलने वाले इस युद्ध में तुर्रा के योद्धा कलंगी के योद्धाओं ने युद्ध करते हैं। युद्ध के दौरान जलता तीर लगने से कई लाेग घायल भी होते हैं। लेकिन इन सब के बीच उत्साह में कहीं कमी नहीं आती है। जैसे ही अंधेरा होता है युद्ध समाप्त कर दिया जाता है।

रियासतकाल से चली आ रही है युद्ध की परंपरा।

रियासतकाल से चली आ रही है युद्ध की परंपरा।

लोगों ने बताया इस युद्ध को धरोहर
कलंगी दल के एक योद्धा का कहना था कि यह परंपरा हमारे पूर्वजों ने हमें दी है। रतलाम, उज्जैन, इंदौर सहित कई जिलों से लोग यहां युद्ध देखने आते हैं। पिछले 28 सालों से हिंगोट युद्ध देखने आ रहे राजेंद्र ने कहा कि मैं तो three बजे से ही मैदान के बाहर अपनी जगह पर कब्जा कर लेता हूं। ये अनूठा खेल है, जो उन्हें बहुत लुभाता है। इसका रोमांच भी भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाले क्रिकेट मैच की तरह ही है। इस बार युद्ध में संशय होने से वे थोड़े निराश नजर आए।

ऐसे बनता है हिंगोट

  • हिंगोट हिंगोरिया नाम के पेड़ पर पैदा होने वाला फल है। इसे दिवाली से एक महीने पहले लोग जंगल से तोड़ लाते हैं। नींबू के आकार का यह फल नारियल के समान कठोर और भीतर से खोखला होता है।
  • फल को ऊपर से साफ कर भीतर से उसका गूदा निकाल दिया जाता है। इसके बाद सूखने के लिए धूप में रख दिया जाता है। इसमें एक ओर बड़ा छेद कर उसे बारूद से भरकर पीली मिट्‌टी से मुंह बंद कर दिया जाता है।
  • हिंगोट के दूसरे छोर पर छोटा छेद कर बारूद की रंजक (बत्ती) लगा दी जाती है। इस तरह तैयार हुए हिंगोट पर eight इंच लंबी बांस की कमची बांधी जाती है, ताकि निशाना सीधा लगे।
  • नवरात्र के पहले से ही यौद्धा इसे तैयार करने की तैयारी शुरू कर देते हैं। इस खेल के दौरान सुरक्षा के कई इंतजाम किए जाते हैं।

राजीव गांधी ने मालवा कला उत्सव में बुलवाया था
1984 में दिल्ली में हुए मालवा कला उत्सव में विशेष आमंत्रण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सामने तुर्रा व कलंगी दल के योद्धाओं ने इसका प्रदर्शन किया था। तब करीब 16 योद्धाओं को नगर के प्रकाश जैन दिल्ली ले गए थे। दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में करीब एक घंटे इसका प्रदर्शन किया गया था। यह युद्ध कब से शुरू हुआ, इसका क्या इतिहास है, कोई नहीं जानता।

22 साल के युवक की मौत के बाद कोर्ट पहुंचा था मामला
साल 2017 में हिंगोट युद्ध के खिलाफ एक दायर जनहित याचिका हाई कोर्ट में दायर की गई थी। अक्टूबर 2017 में गौतमपुरा में बड़नगर तहसील के ग्राम दातरवां का 22 साल का किशोर मालवीय दोस्तों के साथ हिंगोट युद्ध देखने पहुंचा था। वह दर्शक दीर्घा में बैठा था तभी एक हिंगोट उसके सिर पर लगा। उसे गंभीर हालत में एमवाय अस्पताल लाया गया, जहां उसकी इलाज के दौरान मौत हो गई थी। करीब सवा घंटे चले हिंगोट युद्ध में 38 लोग घायल हुए थे। मामले में कोर्ट ने प्रशासन से जवाब देने को कहा था।

सीमा की रक्षा के लिए जवान करते थे हमला

किंवदंती है कि रियासतकाल में गौतमपुरा क्षेत्र की सीमाओं की रक्षा के लिए तैनात जवान आक्रमणकारियों पर हिंगोट से हमले करते थे। स्थानीय लोगों के अनुसार हिंगोट युद्ध एक किस्म के अभ्यास के रूप में शुरू हुआ था और उसके बाद इससे धार्मिक मान्यताएं जुड़ती चली गईं।



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