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गारुएक दिन पहले

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  • टाइगर रिजर्व के वनवासियों का विस्थापन करना सरकार भ्ूली, लोगों के पास रोजगार नहीं

विस्थापन को लेकर केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को किस तरह ताख पर रखा जाता है, इसे जानना-समझना हो तो आपको पलामू व्याघ्र परियोजना के तहत बारेसांड के कुजरूम ग्राम में देखना चाहिए। किस तरह से अदृश्य बाघ के नाम पर बरसों से जंगल के इलाके में रह रहे सैकड़ों आदिवासियों को केवल इसलिए विस्थापित किया जा रहा है कि यह क्षेत्र बफर एरिया घोषित है। इसके तहत पलामू टाइगर रिजर्व क्षेत्र में बसे ग्रामों को विस्थापन करने की तैयारी पिछले कई सालों से की जा रही है, लेकिन अभी तक विस्थापन नहीं हुआ है। ऐसा लगता है जैसे टाइगर रिज़र्व बनाकर इन वन ग्रामों का विस्थापन करना सरकार भूल गयी है। जिस कारण इन ग्रामीणों के पास अब ना रोजगार है और ही खाने को दाने। इसके चलते ग्रामीणों के समक्ष भुखमरी की समस्या खड़ी हो गई है।

गौरतलब हो कि गारू के बारेसांड पंचायत अंतर्गत लाटू कुजरुम गांव को पलामू व्याघ्र परियोजना के तहत टाइगर रिजर्व क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। इस गांव के विस्थापन करने की घोषणा वन विभाग द्वारा की गई, लेकिन विस्थापित करना भूल गई है। इस प्रक्रिया में पिछले चार वर्षों से ग्रामीण परेशान है और इनकी हालात दिन प्रतिदिन ख़राब होते जा रही है। कुजरूम के ग्रामीणों ने बताया कि वन विभाग द्वारा पिछले चार वर्षों से विस्थापन के नाम हमें परेशान किया जा रहा है। इस बीच ना हमें विस्थापित किया जा रहा है और न ही कोई रोजगार ही दिया जा रहा है। इससे हमारे घर में भुखमरी की हालात उत्पन्न हो गए हैं। गांव के ही फिल्मोन उरांव ने बताया कि पिछले वर्षों से हमारे पूर्वज इस गांव में रहते आ रहे हैं। वर्ष 2011 में वन पट्टा देकर हमें इस भूमि का मालिकाना हक दिया गया था,पर यह वनपट्टा हमारे लिए सिर्फ एक कागज का टुकड़ा साबित हुआ। इसका उपयोग न ही हम सरकार द्वारा दी गयी ज़मीन को बचाने के लिए कर सकते है और न ही बच्चों के भविष्य बनाने के लिए। क्योंकि इस वनपट्टा से बच्चों का आवासीय और जाति प्रमाण पत्र बनता ही नहीं है।

इसलिए हमलोगों ने सरकार द्वारा विस्थापन प्रस्ताव भी स्वीकार किया था जिसके तहत वन विभाग के द्वारा प्रत्येक वयस्क व्यक्ति को 15 लाख रुपए या पोलपोल व लाइ गांव में 5 एकड़ भूमि देने का बात कही गयी थी लेकिन वर्ष 2015-16 से विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हुई थी जो अब भी जारी है परंतु इस विस्थापन के नाम पर वन विभाग के द्वारा ना हमें किसी तरह की मजदूरी करने दिया जा रहा और ना ही वन विभाग में हमारा मजदूरी बकाया भुगतान दिया जा रहा। गांव में लगभग 50 परिवार है जिनका मनरेगा जॉब कार्ड बना है परंतु वन विभाग के द्वारा बीडीओ से मनरेगा में कार्य नहीं देने हेतु पत्राचार किया गया जिससे अब मनरेगा में भी कार्य मिलना बंद हो गया। इससे उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई है।



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