}; (function(d, s, id){ var js, fjs = d.getElementsByTagName(s)[0]; if (d.getElementById(id)) {return;} js = d.createElement(s); js.id = id; js.src = "https://connect.facebook.net/en_US/sdk.js"; fjs.parentNode.insertBefore(js, fjs); }(document, 'script', 'facebook-jssdk'));


Advertisements से है परेशान? बिना Advertisements खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

झुंझनुं19 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक
  • अधिकारियों के अनुसार सरकारी स्कूलों में अधिकांश बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर
  • सरकारी स्कूलों में शिक्षक व बच्चों के बीच सीधा संवाद नहीं है

कोरोनाकाल में पढ़ाई का डिजीटलीकरण होते होते अब जटिल परिस्थितियों सामने आने लगी हैं। लॉकडाउन व कोरोना के खतरे के कारण स्कूलें लगातार बंद हैं। हालाकि अप्रैल से ही स्कूलों में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए पढ़ाई शुरू कर दी गई थी, लेकिन इसका सबसे बड़ा खामियाजा सरकारी स्कूल के उन बच्चों को भुगतना पड़ रहा है जिनके पास मोबाइल व इंटरनेट जैसी सुविधाएं पर्याप्त नहीं है।

इनके अभिभावक भी इतने जागरुक नहीं है कि बच्चों की पढ़ाई को घर बैठे पूरा करवा सकें। जिले में सरकारी व निजी स्कूलों में कुल three लाख 13 हजार बच्चे अध्ययनरत हैं। इनमें सरकारी स्कूलों में एक लाख 61 हजार 800 बच्चे हैं।

चौंकाने वाली बात ये है कि इन एक लाख 61 हजार 800 बच्चों में से महज 54000 बच्चे ही पढ़ाई के लिए उन वॉट्सअप ग्रुप से जुड़े हैं। जो संस्था प्रधानों ने बनाए हैं। यानी महज 33.37 प्रतिशत। इसमें भी केवल 12 से 15 प्रतिशत बच्चे ही मासिक टेस्ट आदि में शामिल हो पाते हैं। इधर, निजी स्कूलों करीब एक लाख 52 हजार छात्र छात्राओं में से 90 प्रतिशत बच्चे ऑनलाइन क्लासेज से जुड़े हैं।

सरकारी स्कूलों में एक और समस्या यह भी सामने आ रही है कि यहां शिक्षक व बच्चों के बीच सीधा संवाद नहीं है। हालांकि स्माईल कार्यक्रम की जून महीने की रैंकिंग में झुंझुनूं जिला पूरा प्रदेश में टाॅप पर रहा।

जिले के 80 फीसदी शिक्षकाें ने टीचर्स काॅलिंग में 79.79 प्रतिशत भागीदारी के आधार पर Eight अंक मिले। ताे क्विज कार्यक्रम में 2.90 फीसदी भागीदारी पर 0.98 अंक मिले है। 8.98 अंक लेकर जिला पूरे प्रदेश में पहले नंबर पर रहा।
निजी स्कूलों की स्थिति

  • अप्रेल में ही गूगल मीट, जूम जैसे एप के जरिए बच्चों को ऑनलाइन क्लासेज से जोड़ा, खुद के एप भी बनाए
  • टीचर्स की तीन सप्ताह की ट्रेनिंग करवाई, स्मार्ट बोर्ड आदि पहले से थे, टीचर्स घर से भी पढ़ा सकें यह व्यवस्था भी की उन्हें जरुरी उपकरण दिए
  • पैरेंट्स की भी ऑनलाइन मीटिंग लेकर नए कंसेप्ट के बारे में समझाया, उनसे समय समय पर फिडबैक भी लिया
  • स्कूलों में स्टूडियो बनाए, ऑनलाइन क्लास रूम के लिए सीबीएसई ने डिजीटल स्टडी बुक दी। ताे स्कूलाें ने बच्चों तक किताबें पहुंचाई।
  • कमियों को दूर करते रहे, नतीजा अब ऑनलाइन क्लासेज ही रेगुलर क्लासेज की तरह चल रही हैं। बच्चे व टीचर ऑनलाइन रहते हैं। दोनों के बीच सीधा संवाद होता है।

निजी स्कूलों के बच्चे

  • कक्षा दस के एक बच्चे ने बताया कि उसका अर्द्धवार्षिक परीक्षा तक का कोर्स पूरा है। अप्रैल से ही ऑनलाइन क्लासेज चल रही हैं।
  • कक्षा 12 के एक बच्चे ने बताया कि ऑनलाइन क्लासेज में शिक्षकों से सीधा संवाद होता है। काेई भी दिक्कत आती है तो तुरंत टीचर से सवाल पूछ सकते हैं।
  • कक्षा नौ के एक बच्चे ने बताया कि रोजाना ऑनलाइन क्लासेज चल रही हैं। उनमें हाजिरी भी लगती है। रोजाना होमवर्क मिल रहा है। {ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों ने नेट स्पीड की समस्या बताई, लेकिन उनका कहना था कि उन्हें स्कूल के एप से डाउनलोड करने की सुविधा मिलती है। जिससे बाद में भी वे देख सकते हैं।

सरकारी स्कूलों की दशा

  • लॉकडाउन होते ही स्कूल बंद हो गए। समय पर कोई प्लान ही नहीं बना कि बच्चों को कैसे पढ़ाना है।
  • समय पर टीचर्स की कोई ट्रेनिंग नहीं हुई, बाद में कुछ कार्यक्रम बनाए गए।
  • अब केवल शिक्षकों को बुलाया जा रहा है। कई बच्चे स्कूलों में आकर इन शिक्षकों से सवाल समझकर जाते हैं।
  • अधिकांश बच्चों के पास ना तो इंटरनेट और स्मार्ट फोन, उनकी पढ़ाई के कोई इंतजाम नहीं है। शिक्षक पूरे समय ड्यूटी दे रहे हैं, लेकिन बच्चों काे लाभ नहीं।
  • स्माइल कार्यक्रम के तहत वीडियाे आते हैं। वे अध्यापकों को दे दिए जाते हैं। जिन बच्चों के पास मोबाइल हो उन तक पहुंच दिए जाते हैं। बच्चों का शिक्षकों से कोई सीधा संवाद ही नहीं है। कई बच्चों ने किताबें नहीं होने की बात भी कही।

सरकारी स्कूलों के बच्चे

  • कक्षा आठ में पढ़ने वाले एक बच्चे ने बताया कि पिता खेती करते हैं। मोबाइल उनके पास ही रहता है। मां के पास मोबाइल नहीं है। इसलिए पढ़ाई से जुड़ा कोई भी वीडियो आदि देख ही नहीं पाता।
  • 10वीं के बच्चे का कहना था कि इस साल बोर्ड का एग्जाम होना है। किताबें जरुर मिली हैं, लेकिन शिक्षकों से सीधा संवाद नहीं हो पाता।
  • 12वीं के एक बच्चे ने बताया कि मेरे पास शिक्षकों के नंबर हैं। उनसे फोन पर बात कर कुछ समझ में नहीं आता तो समझ लेता हूं। शिक्षक स्कूल में रहते हैं। किताबें भी मिल गई हैं।
  • ग्रामीण क्षेत्र से जुड़े अधिकांश बच्चों का कहना था कि नेट की स्पीड और मोबाइल आदि नहीं होने से वे पढ़ाई से नहीं जुड़ पा रहे हैं। बच्चों ने बताया कि उन्हें होमवर्क भी नहीं मिलता।

आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे अधिक इसलिए समस्या
^सरकारी स्कूलों के अधिकाधिक बच्चों को ऑनलाइन एज्युकेशन से जोड़ने के लिए संस्था प्रधानों और शिक्षकों को विशेष रूप से निर्देशित कर दिया है। इसमें जिले में अच्छा काम भी हुआ है, लेकिन वंचित वर्ग के बच्चे सरकारी स्कूलों में अधिक होने के चलते इस तरह का गैप संभव हो सकता है। स्माइल टू कार्यक्रम में इस पर विशेष रूप से फोकस किया गया है।
अमर सिंह पचार, जिला शिक्षा अधिकारी, झुंझुनूं



Supply hyperlink

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *